हाँ, सीख गया हूँ मैं
अब कोई बात, चुभती नहीं
अब किसी की कमी, सताती नहीं
आँखों तक आते आते, गम सूख जाते है
अश्क़ों में अब कोई, नमी होती नहीं
लगता है के अब, कमज़ोर न रहे
शायद दिल से, मझबूर न रहे
कहकहे लगते है आज
के जज़्बातों से अब, परेशां न रहे
दुनिया कहती थी, बचपना छोड़ दो
प्यार मोहब्बत का, फ़साना छोड़ दो
कहती रही, के बड़े हो जाओ
किसी के लिए खुद को, खोना छोड़ दो
लगता है अब, सीख गया हूँ मैं
अकेले रहना, मान गया हूँ मैं
इंसान ही हूँ आज भी लेकिन
अपनी पहचान भूलना, सीख गया हूँ मैं..
अपनी ही पहचान भूला देना, सीख गया हूँ मैं!