ज़िन्दगी एक किताब

रोज क्या लिख्खे ज़िन्दगी के पन्नो पर,
एक किताब है ये.. कहीं खाली ना रह जाए..

आखिर कहाँ जाऊ, दिन भर भटकता हुआ,
चंद घंटे है, कहीं रात ना हो जाए ..


ज़िन्दगी उस खयाल की तरह है,
जो कल रात को आया था..

जिसे याद रखने के लिए,
मैंने रोज एक निशाना रख्खा था ..


आज उस निशाने को,
फिरसे ढूँढ रहा हूँ..

जैसे ज़िन्दगी जीने के लिए,
रोज बहाना ढूँढ रहा हूँ ..


आखिर क्या लिख्खू,
के ये किताब खाली ना लगे..

पन्ने पन्ने से सुलझती हुई,
एक कहानी लगे….

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